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HAM मॉडल में सड़क परियोजनाओं की गुणवत्ता पर उठे सवालों के बीच NHAI का बड़ा फैसला


अब BOT-cum-Annuity मॉडल पर जोर


क्या भारत के सड़क क्षेत्र में PPP मॉडल का नया दौर शुरू होने वाला है?


पिछले एक दशक में भारत ने राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं। देश में एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों का नेटवर्क अभूतपूर्व गति से बढ़ा है। इस सफलता के पीछे सरकार की नीतियों के साथ-साथ Public-Private Partnership (PPP) मॉडल की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।


वर्ष 2015 के बाद Hybrid Annuity Model (HAM) सड़क निर्माण का सबसे लोकप्रिय मॉडल बनकर उभरा। इस मॉडल ने उस समय सड़क क्षेत्र को नई दिशा दी, जब निजी निवेशक BOT (Build-Operate-Transfer) परियोजनाओं से दूरी बनाने लगे थे। HAM के माध्यम से हजारों किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हुआ और कई वर्षों से रुकी परियोजनाओं को गति मिली।


लेकिन समय के साथ इस मॉडल की कुछ व्यावहारिक सीमाएँ भी सामने आने लगीं। कुछ परियोजनाओं में सड़क की गुणवत्ता, रखरखाव और दीर्घकालिक जवाबदेही को लेकर सवाल उठे। इन्हीं अनुभवों से सीख लेते हुए National Highways Authority of India (NHAI) अब एक नया BOT-cum-Annuity Model लेकर आई है, जिसका उद्देश्य निजी निवेश को बढ़ावा देने के साथ-साथ बेहतर गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

HAM मॉडल क्यों लाया गया था?

वर्ष 2012 से 2014 के बीच BOT (Toll) मॉडल गंभीर संकट का सामना कर रहा था। उस समय अधिकांश परियोजनाओं में ट्रैफिक का अनुमान वास्तविकता से काफी अधिक लगाया गया था। परिणामस्वरूप टोल संग्रह अपेक्षा से कम रहा और कई परियोजनाएँ वित्तीय संकट में फंस गईं। अनेक डेवलपर्स अपने ऋण चुकाने में असमर्थ हो गए और बैंकों का सड़क परियोजनाओं पर विश्वास भी कम होने लगा।

इस मॉडल के तहत सरकार निर्माण लागत का एक बड़ा हिस्सा स्वयं वहन करती है, जबकि शेष राशि निजी डेवलपर ऋण और इक्विटी के माध्यम से जुटाता है। निर्माण पूरा होने के बाद टोल संग्रह का अधिकार सरकार के पास रहता है और डेवलपर को निश्चित अवधि तक एन्युटी (Annuity) का भुगतान किया जाता है।

इस व्यवस्था ने ट्रैफिक जोखिम को काफी हद तक कम किया और सड़क क्षेत्र में निजी निवेश को फिर से आकर्षित किया।


HAM मॉडल की सीमाएँ क्या रहीं?


HAM मॉडल ने निर्माण कार्य को तेज किया, लेकिन समय के साथ कुछ चुनौतियाँ भी सामने आईं।


सबसे बड़ी चुनौती Ownership और Accountability की रही। चूंकि टोल संग्रह सरकार के पास रहता है, इसलिए निजी डेवलपर की आय सड़क पर आने वाले ट्रैफिक से सीधे जुड़ी नहीं होती। उसकी आय निश्चित एन्युटी के रूप में मिलती रहती है।


इसके कारण कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि डेवलपर के लिए सड़क की गुणवत्ता, बेहतर रखरखाव और उपयोगकर्ता अनुभव को लगातार बेहतर बनाने का आर्थिक प्रोत्साहन अपेक्षाकृत कम हो जाता है।


इसके अतिरिक्त, कुछ परियोजनाओं में निर्माण के बाद परिसंपत्तियों के संचालन, रखरखाव और मोनेटाइजेशन में अलग-अलग संस्थाओं की भागीदारी के कारण जवाबदेही भी विभाजित हो जाती है। यदि निर्माण में कोई बड़ी तकनीकी कमी सामने आती है, तो मूल डेवलपर की जिम्मेदारी तय करना अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है।


यही कारण है कि हाल के परामर्शों के दौरान कई विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि निर्माण के तुरंत बाद परियोजना में Ownership बदलने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। कम-से-कम एक वर्ष या एक मानसून तक मूल डेवलपर को परियोजना से जुड़े रहने का प्रस्ताव भी रखा गया ताकि निर्माण गुणवत्ता का वास्तविक परीक्षण हो सके।


NHAI अब BOT-cum-Annuity मॉडल क्यों ला रही है?

NHAI का मानना है कि भारत को अगले दस वर्षों में सड़क क्षेत्र में लगभग 60 अरब अमेरिकी डॉलर के अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता होगी। इतनी बड़ी राशि केवल सरकारी बजट से उपलब्ध कराना संभव नहीं है।


इसलिए आवश्यकता है कि निजी क्षेत्र का निवेश फिर से बड़े पैमाने पर आकर्षित किया जाए। लेकिन इसके लिए ऐसा मॉडल चाहिए जिसमें जोखिमों का संतुलित वितरण हो, बैंक आसानी से ऋण दें और डेवलपर के पास सड़क की गुणवत्ता बनाए रखने का स्पष्ट आर्थिक प्रोत्साहन भी हो।


इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए BOT-cum-Annuity मॉडल तैयार किया गया है।

BOT-cum-Annuity मॉडल कैसे काम करेगा?

इस मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि टोल संग्रह का अधिकार निजी concessionaire के पास रहेगा।

इसका अर्थ है कि यदि सड़क की गुणवत्ता अच्छी होगी, यात्रा सुविधाजनक होगी और ट्रैफिक बढ़ेगा, तो उसका सीधा लाभ concessionaire को मिलेगा। इससे सड़क के बेहतर रखरखाव और दीर्घकालिक प्रदर्शन को बढ़ावा मिलेगा।

सरकार निर्माण अवधि में परियोजना की व्यवहार्यता के आधार पर 10% से 25% तक Project Financial Support (PFS) प्रदान करेगी। यदि किसी परियोजना में टोल आय पर्याप्त नहीं होती, तो सरकार एन्युटी के माध्यम से उस राजस्व अंतर की भरपाई करेगी।

बैंकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एन्युटी का भुगतान वार्षिक के बजाय तिमाही (Quarterly) आधार पर करने का प्रस्ताव है। इससे ऋण भुगतान और परियोजना की नकदी प्रवाह (Cash Flow) में बेहतर तालमेल रहेगा।

इसके अतिरिक्त Outstanding Debt पर ब्याज का भुगतान अलग से किया जाएगा, जिससे ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम होगा और परियोजनाओं की बैंकबिलिटी बढ़ेगी।

HAM और BOT-cum-Annuity में सबसे बड़ा अंतर

HAM मॉडल का मुख्य उद्देश्य निर्माण को गति देना था, जबकि BOT-cum-Annuity मॉडल निर्माण के साथ-साथ सड़क की गुणवत्ता, संचालन, रखरखाव और दीर्घकालिक जवाबदेही पर भी समान रूप से जोर देता है।

HAM में डेवलपर की आय मुख्यतः निश्चित एन्युटी पर आधारित होती है। इसके विपरीत, BOT-cum-Annuity मॉडल में डेवलपर की आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा टोल संग्रह से आएगा। इसलिए उसके लिए सड़क को बेहतर स्थिति में बनाए रखना केवल अनुबंध की शर्त नहीं बल्कि एक व्यावसायिक आवश्यकता भी होगी।

यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इसे BOT की परिचालन दक्षता और HAM की वित्तीय सुरक्षा का संतुलित मिश्रण मान रहे हैं।

क्या यह मॉडल भारत के सड़क क्षेत्र को नई दिशा देगा?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि यह मॉडल अभी परामर्श और अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जोखिमों का वितरण कितना संतुलित रखा जाता है, बैंकों की चिंताओं को किस हद तक दूर किया जाता है और अनुबंध की शर्तें कितनी स्पष्ट एवं व्यावहारिक बनाई जाती हैं।

फिर भी इतना स्पष्ट है कि NHAI भविष्य के PPP मॉडल को केवल निर्माण तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि वह ऐसा ढांचा तैयार करना चाहती है जिसमें निजी निवेश, बेहतर गुणवत्ता, मजबूत रखरखाव और दीर्घकालिक जवाबदेही—चारों उद्देश्यों को एक साथ प्राप्त किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत की अर्थव्यवस्था जितनी तेज़ी से आगे बढ़ेगी, उतनी ही तेज़ी से आधुनिक और टिकाऊ सड़क नेटवर्क की आवश्यकता भी बढ़ेगी। इस लक्ष्य को केवल सरकारी संसाधनों के सहारे हासिल करना संभव नहीं है। इसलिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को फिर से आकर्षक बनाना समय की आवश्यकता है।

प्रस्तावित BOT-cum-Annuity Model इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह केवल एक नया PPP मॉडल नहीं होगा, बल्कि भारत के सड़क क्षेत्र में गुणवत्ता, जवाबदेही और निवेश—तीनों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने वाला एक नया अध्याय साबित हो सकता है।


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