1. पारंपरिक शिक्षा प्रणाली: जब योग्यता ही सब कुछ थी एक समय था जब शिक्षा का मूल आधार केवल योग्यता हुआ करती थी। संसाधन सीमित थे, विकल्प कम थे, लेकिन व्यवस्था में एक स्पष्टता, अनुशासन और संतुलन मौजूद था। समाज यह स्वीकार करता था कि हर व्यक्ति की क्षमता अलग होती है, और उसी के अनुसार उसका मार्ग निर्धारित होना चाहिए। परिवार और शिक्षक बच्चों की रुचि, स्वभाव और बौद्धिक क्षमता को समझकर उन्हें दिशा देते थे। मेधावी छात्र इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे क्षेत्रों में जाते थे, जहाँ गहरी समझ और कठोर परिश्रम की आवश्यकता होती थी। मध्यम क्षमता वाले छात्र बैंकिंग, एसएससी या रेलवे जैसी स्थिर और संरचित नौकरियों की तैयारी करते थे। वहीं, जिनमें विश्लेषणात्मक सोच, धैर्य और दीर्घकालिक समर्पण की क्षमता होती, वे यूपीएससी जैसे कठिन और प्रतिष्ठित लक्ष्य का चयन करते थे। इस व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें असफलता के लिए भी सम्मानजनक स्थान था। यदि कोई छात्र अपने प्राथमिक लक्ष्य में सफल नहीं हो पाता, तो उसके पास शिक्षक बनने का विकल्प होता था। बी.एड., सीटीईटी या अन्य पात्रता परीक्षाओं के माध्यम से वह एक ऐस...
कुछ साल पहले तक ‘Leftism’ यानी वामपंथी सोच सिर्फ JNU, DU या FTII की दीवारों तक सिमटी थी। वहाँ के कुछ लड़के-लड़कियाँ बहस करते थे, क्रांति के नारे लगाते थे, और शाम को कैंटीन में चाय पीते हुए पूंजीवाद को गालियाँ देते थे। हम सोचते थे — “ठीक है, चार किताबें पढ़ ली हैं, थोड़े दिन में समझ आ जाएगा।” पर अब? अब यह वायरस घर के दरवाज़े तक नहीं, आपके ड्रॉइंग रूम के सोफे पर बैठ चुका है। चुपचाप, इंस्टाग्राम की रील्स और Netflix के जरिये आपके बच्चे की सोच में ज़हर घोल चुका है और आपको पता भी नहीं चला। आपने उसे अच्छे स्कूल में भेजा, सबसे महंगा स्मार्टफोन दिया, coding class करवाई… लेकिन आपने ये नहीं देखा कि अब वो आपको ही सवालों के घेरे में खड़ा कर रहा है। अब वही बच्चा कहता है — “Respect is earned, not given. Even parents.” अब आपकी नसीहत उसे ज़हर लगती है। आपकी चुप्पी उसकी आज़ादी है। आप कुछ कहो, तो बोलेगा — “Stop being toxic.” और आप डर जाते हो कि कहीं उसका ‘mental health’ न बिगड़ जाए। बोलिए — क्या ये सही है? क्या आप हर सुबह बच्चे को उठाने जाते हो और वो 9 बजे तक सोया रहता है — बोलता है, “Don’t dis...