कागज़ पर यह बस एक आदेश है, एक रूटीन प्रक्रिया। लेकिन मेरे लिए यह हमेशा एक नई शुरुआत और एक अधूरा अंत साथ लेकर आता है। शायद मेरे संस्थान की यही प्राथमिकता होगी—जहाँ ज़रूरत, वहीं भेज दो। और शायद यह भी सच है कि मैं नई जगह पर अपना और बेहतर दे पाऊँगा, या मेरी जगह जो आएगा, वह मुझसे बेहतर कर पाएगा। इन बातों में तर्क है, लेकिन इनके बीच एक सच्चाई हमेशा खड़ी रहती है l हर बार कुछ पीछे छूट जाता है। हर बार की तरह इस बार भी मैं अपना बैग समेटूंगा। कुछ सामान कम करूंगा, कुछ यादें फिर पीछे छोड़ दूंगा। नया शहर, नए लोग, नया कमरा… और वही पुराना मैं। फर्क बस इतना है कि अब पहली बार जैसा उत्साह नहीं होता और आखिरी बार जैसा दर्द भी नहीं। यह सब अब एक आदत जैसा हो गया है चलते रहने की आदत, बिना पूरी तरह कहीं रुके। मुझे आज भी याद है, जब बैंक जॉइन किया था। इंटरव्यू में पहला सवाल था—“Are you ready to relocate?” मैंने बिना सोचे जवाब दिया था—“I am from Bihar.” शायद उस एक जवाब में ही मेरी पूरी ज़िंदगी छिपी थी। हमारे लिए “relocate” कोई विकल्प नहीं होता, वह तो बचपन से तय रास्ता होता है। पढ़ाई के लिए घर छोड़ना, नौकरी के लिए ...
1. पारंपरिक शिक्षा प्रणाली: जब योग्यता ही सब कुछ थी एक समय था जब शिक्षा का मूल आधार केवल योग्यता हुआ करती थी। संसाधन सीमित थे, विकल्प कम थे, लेकिन व्यवस्था में एक स्पष्टता, अनुशासन और संतुलन मौजूद था। समाज यह स्वीकार करता था कि हर व्यक्ति की क्षमता अलग होती है, और उसी के अनुसार उसका मार्ग निर्धारित होना चाहिए। परिवार और शिक्षक बच्चों की रुचि, स्वभाव और बौद्धिक क्षमता को समझकर उन्हें दिशा देते थे। मेधावी छात्र इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे क्षेत्रों में जाते थे, जहाँ गहरी समझ और कठोर परिश्रम की आवश्यकता होती थी। मध्यम क्षमता वाले छात्र बैंकिंग, एसएससी या रेलवे जैसी स्थिर और संरचित नौकरियों की तैयारी करते थे। वहीं, जिनमें विश्लेषणात्मक सोच, धैर्य और दीर्घकालिक समर्पण की क्षमता होती, वे यूपीएससी जैसे कठिन और प्रतिष्ठित लक्ष्य का चयन करते थे। इस व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें असफलता के लिए भी सम्मानजनक स्थान था। यदि कोई छात्र अपने प्राथमिक लक्ष्य में सफल नहीं हो पाता, तो उसके पास शिक्षक बनने का विकल्प होता था। बी.एड., सीटीईटी या अन्य पात्रता परीक्षाओं के माध्यम से वह एक ऐस...