कागज़ पर यह बस एक आदेश है, एक रूटीन प्रक्रिया। लेकिन मेरे लिए यह हमेशा एक नई शुरुआत और एक अधूरा अंत साथ लेकर आता है। शायद मेरे संस्थान की यही प्राथमिकता होगी—जहाँ ज़रूरत, वहीं भेज दो। और शायद यह भी सच है कि मैं नई जगह पर अपना और बेहतर दे पाऊँगा, या मेरी जगह जो आएगा, वह मुझसे बेहतर कर पाएगा। इन बातों में तर्क है, लेकिन इनके बीच एक सच्चाई हमेशा खड़ी रहती है l हर बार कुछ पीछे छूट जाता है। हर बार की तरह इस बार भी मैं अपना बैग समेटूंगा। कुछ सामान कम करूंगा, कुछ यादें फिर पीछे छोड़ दूंगा। नया शहर, नए लोग, नया कमरा… और वही पुराना मैं। फर्क बस इतना है कि अब पहली बार जैसा उत्साह नहीं होता और आखिरी बार जैसा दर्द भी नहीं। यह सब अब एक आदत जैसा हो गया है चलते रहने की आदत, बिना पूरी तरह कहीं रुके। मुझे आज भी याद है, जब बैंक जॉइन किया था। इंटरव्यू में पहला सवाल था—“Are you ready to relocate?” मैंने बिना सोचे जवाब दिया था—“I am from Bihar.” शायद उस एक जवाब में ही मेरी पूरी ज़िंदगी छिपी थी। हमारे लिए “relocate” कोई विकल्प नहीं होता, वह तो बचपन से तय रास्ता होता है। पढ़ाई के लिए घर छोड़ना, नौकरी के लिए ...