कुछ साल पहले तक ‘Leftism’ यानी वामपंथी सोच सिर्फ JNU, DU या FTII की दीवारों तक सिमटी थी। वहाँ के कुछ लड़के-लड़कियाँ बहस करते थे, क्रांति के नारे लगाते थे, और शाम को कैंटीन में चाय पीते हुए पूंजीवाद को गालियाँ देते थे। हम सोचते थे — “ठीक है, चार किताबें पढ़ ली हैं, थोड़े दिन में समझ आ जाएगा।” पर अब? अब यह वायरस घर के दरवाज़े तक नहीं, आपके ड्रॉइंग रूम के सोफे पर बैठ चुका है। चुपचाप, इंस्टाग्राम की रील्स और Netflix के जरिये आपके बच्चे की सोच में ज़हर घोल चुका है और आपको पता भी नहीं चला। आपने उसे अच्छे स्कूल में भेजा, सबसे महंगा स्मार्टफोन दिया, coding class करवाई… लेकिन आपने ये नहीं देखा कि अब वो आपको ही सवालों के घेरे में खड़ा कर रहा है। अब वही बच्चा कहता है — “Respect is earned, not given. Even parents.” अब आपकी नसीहत उसे ज़हर लगती है। आपकी चुप्पी उसकी आज़ादी है। आप कुछ कहो, तो बोलेगा — “Stop being toxic.” और आप डर जाते हो कि कहीं उसका ‘mental health’ न बिगड़ जाए। बोलिए — क्या ये सही है? क्या आप हर सुबह बच्चे को उठाने जाते हो और वो 9 बजे तक सोया रहता है — बोलता है, “Don’t dis...