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ट्रांसफर

कागज़ पर यह बस एक आदेश है, एक रूटीन प्रक्रिया। लेकिन मेरे लिए यह हमेशा एक नई शुरुआत और एक अधूरा अंत साथ लेकर आता है। शायद मेरे संस्थान की यही प्राथमिकता होगी—जहाँ ज़रूरत, वहीं भेज दो। और शायद यह भी सच है कि मैं नई जगह पर अपना और बेहतर दे पाऊँगा, या मेरी जगह जो आएगा, वह मुझसे बेहतर कर पाएगा। इन बातों में तर्क है, लेकिन इनके बीच एक सच्चाई हमेशा खड़ी रहती है l हर बार कुछ पीछे छूट जाता है।

हर बार की तरह इस बार भी मैं अपना बैग समेटूंगा। कुछ सामान कम करूंगा, कुछ यादें फिर पीछे छोड़ दूंगा। नया शहर, नए लोग, नया कमरा… और वही पुराना मैं। फर्क बस इतना है कि अब पहली बार जैसा उत्साह नहीं होता और आखिरी बार जैसा दर्द भी नहीं। यह सब अब एक आदत जैसा हो गया है चलते रहने की आदत, बिना पूरी तरह कहीं रुके।

मुझे आज भी याद है, जब बैंक जॉइन किया था। इंटरव्यू में पहला सवाल था—“Are you ready to relocate?” मैंने बिना सोचे जवाब दिया था—“I am from Bihar.” शायद उस एक जवाब में ही मेरी पूरी ज़िंदगी छिपी थी। हमारे लिए “relocate” कोई विकल्प नहीं होता, वह तो बचपन से तय रास्ता होता है। पढ़ाई के लिए घर छोड़ना, नौकरी के लिए शहर छोड़ना, और फिर ज़िंदगी भर एक जगह से दूसरी जगह जाते रहना—यही एक सामान्य जीवन बन जाता है।

हर ट्रांसफर के साथ बाहर से लगता है कि ज़िंदगी आगे बढ़ रही है—नई जगह, नए अनुभव, नई पहचान। लेकिन अंदर कहीं एक सच्चाई चुपचाप साथ चलती है कि हर बार कुछ छूट जाता है। पहले सिर्फ सामान छूटता था, फिर लोग छूटने लगे, और अब धीरे-धीरे जगहें भी छूटती जा रही हैं। एक अजीब सी स्थिति बन जाती है—न नई जगह पूरी तरह अपनी लगती है, न पुरानी जगह पूरी तरह अपनी रह पाती है। हर शहर में थोड़ा-थोड़ा जीता हूँ, लेकिन कहीं भी पूरा नहीं रहता।

हमारे पास घर होते हैं, लेकिन स्थायी नहीं। हमारे पास लोग होते हैं, लेकिन हमेशा साथ नहीं। हमारे पास यादें होती हैं, लेकिन अक्सर अधूरी।

और सच यह है कि ट्रांसफर सिर्फ मेरा नहीं होता। मेरे साथ मेरे परिवार की ज़िंदगी भी हर बार बदलती है। मेरी पत्नी हर नए शहर में खुद को फिर से जोड़ती है। कई बार अपना करियर बदला है, हर बार नई शुरुआत की है—बिना किसी शिकायत के। वह सिर्फ घर नहीं संभालती, वह हर नई जगह को घर बनाती है।

मेरे बच्चे, जिनके लिए स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं होता, बल्कि उनकी पूरी दुनिया होती है—दोस्त, खेल, आदतें, छोटी-छोटी खुशियाँ। हर ट्रांसफर में उनकी वह दुनिया टूट जाती है। उनके दोस्त बदल जाते हैं, उनकी बेंच बदल जाती है, उनकी कहानियाँ अधूरी रह जाती हैं। वे फिर नए नाम सीखते हैं, नए चेहरों में अपनापन ढूंढते हैं और धीरे-धीरे यह भी सीख जाते हैं कि किसी से ज़्यादा जुड़ना नहीं है, क्योंकि फिर जाना है।

घर बदलता है तो सिर्फ दीवारें नहीं बदलतीं। पड़ोस बदल जाता है, गली बदल जाती है, वह दुकान बदल जाती है जहाँ उधार भी मिल जाता था, वह सब्ज़ी वाला बदल जाता है जो नाम से पहचानता था। फूल वाला, प्रेस वाला—वे छोटे-छोटे रिश्ते, जो बिना नाम के बनते हैं, सब छूट जाते हैं। और हर बार हम फिर से कोशिश करते हैं—एक नई जगह को अपना बनाने की। लेकिन सच यही है कि हर बार थोड़ा कम बन पाता है।

अब ट्रांसफर की खबर सुनकर ज़्यादा सोचता नहीं हूँ। बस इतना समझ आता है कि सामान फिर बंधेगा, कमरा फिर बदलेगा और ज़िंदगी फिर से कहीं और सेट हो जाएगी। शायद यह आदत है, या शायद यह स्वीकार्यता है।

लेकिन अंदर कहीं एक बात हमेशा रह जाती है—हम जैसे लोग सिर्फ अपनी जगह नहीं बदलते, हम अपने साथ कई लोगों के छोटे-छोटे सपने भी हर बार पैक करके ले जाते हैं। और हर बार कुछ सपने रास्ते में ही छूट जाते हैं।

घर में, रिश्तेदारी में लोग कहते हैं—“लड़का तो अब well settled है।”मैं बस मुस्कुरा देता हूँ। क्या यही “settled” होना है? या यह एक तरह का “विस्थापन” है, जिसे हम बिना कुछ कहे जीते रहते हैंl क्योंकि सच यह है न हम ठीक से settled हो पाए, न पूरी तरह विस्थापित ही हो पाए।हम बस बीच में कहीं अटक गए हैं।


और ठीक उसी बीच…हमारे मित्र श्का whatsup  संदेश आ जाता है—

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।

छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥

भगवद गीता के 15वें अध्याय का यह श्लोक, जिसे भगवान श्री कृष्ण ने कहा, अचानक सिर्फ एक श्लोक नहीं रह जाता—यह जैसे मेरे जीवन की स्थिति को शब्द दे देता है। वे कहते हैं यह संसार एक उल्टे वृक्ष की तरह है, जिसकी जड़ ऊपर है और शाखाएँ नीचे फैली हुई हैं।

और हम… शायद उन्हीं शाखाओं पर बार-बार स्थान बदलते हुए बैठे हैं।

कभी इस शहर की शाखा,

कभी उस रिश्ते की शाखा,

कभी किसी पहचान की शाखा।

और हर बार जब हम एक शाखा छोड़ते हैं, तो लगता है कुछ छूट गया। लेकिन शायद गीता हमें यह समझा रही है l कि हम शाखा नहीं हैं, हम उस वृक्ष का हिस्सा भी नहीं हैं, हम उससे भी कहीं अधिक गहरे हैं। शायद जिसे हम “बार-बार ट्रांसफर” कहते हैं, उसी को गीता की भाषा में “विरक्ति” की शुरुआत कहा गया हो। यह विरक्ति भागना नहीं है, यह टूटना नहीं है। यह एक ऐसी समझ है जहाँ हम जुड़ते भी हैं, लेकिन खुद को खोते नहीं।

और तब एक और सवाल खड़ा होता है l हम यह बात अपने बच्चों को कैसे समझाएँ?

शायद शब्दों से नहीं,

अपने जीने के तरीके से।

उन्हें यह सिखाकर नहीं कि “किसी से ज़्यादा मत जुड़ो”,

बल्कि यह दिखाकर कि,  “जहाँ रहो, पूरे दिल से रहो… और जब आगे बढ़ो, तो उन यादों को अपने साथ लेकर बढ़ो।” धीरे-धीरे वे खुद समझने लगते हैं

 कि दोस्त छूटते नहीं, बस दूर हो जाते हैं,

कि घर बदलता है, लेकिन परिवार नहीं बदलता,

और कि बदलाव डराने वाली चीज़ नहीं, जीवन का हिस्सा है।

और तब समझ आता है जिन बातों को समझने में हमें 40–45 साल लग जाते हैं, उन्हीं सच्चाइयों को हमारे बच्चे 8–10 साल की उम्र में ही जीना सीख लेते हैं। वे बिना किसी दर्शन के, बिना किसी शास्त्र के, जीवन के “पुरुषोत्तम योग” को जी लेते हैं। और हम…

उसे समझने की कोशिश करते रह जाते हैं।

शायद इसी का नाम जीवन है।

Comments

  1. बहुत ही संवेदनशील और हृदयस्पर्शी लेख। ट्रांसफर के पीछे छिपे भावनात्मक, पारिवारिक और मानवीय पक्ष को आपने बेहद सरल और प्रभावी शब्दों में व्यक्त किया है। विशेषकर गीता के संदर्भ ने लेख को और गहराई प्रदान की है।
    अत्यंत मार्मिक लेख। ट्रांसफर की वास्तविक पीड़ा और जीवन-दर्शन का सुंदर संगम।

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