दिल्ली आज ऐसी राजधानी बन चुकी है जहाँ जीना भी एक चुनौती जैसा लगता है। हवा का AQI 500 से ऊपर, हर सांस में ज़हर, बच्चे मास्क पहनकर स्कूल जाते हुए, अस्पतालों में बढ़ती भीड़, सड़कों पर धुंध और ट्रैफिक, यह हाल किसी भी आधुनिक राजधानी का नहीं होना चाहिए। यमुना की गंदगी और गंदे पानी की समस्या, दिल्ली का एक बड़ा पर्यावरणीय संकट है। दिल्ली पर जनसंख्या का भारी दबाव, सीमित भूमि, भूकंप का खतरा और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे इसे आने वाले समय में और कमजोर बनाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना बिल्कुल स्वाभाविक है कि क्या भारत को अपनी राजधानी बदलने पर विचार करना चाहिए?
दुनिया के कई देशों ने समय की ज़रूरत समझकर अपनी राजधानी बदली है ब्राज़ील ने ब्रासीलिया बनाई, कज़ाखस्तान ने अस्ताना को चुना, इंडोनेशिया नई राजधानी नुसंतारा बना रहा है। यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं थे, बल्कि भविष्य की ज़रूरतों को देखते हुए लिए गए थे। भारत भी आज उसी मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक नई दिशा चुनने की आवश्यकता महसूस होती है।
जब हम भारत के इतिहास को देखते हैं, तो दो बड़े नगर सामने आते हैं: हस्तिनापुर और अयोध्या।हस्तिनापुर महाभारत का राजनीतिक केंद्र था, लेकिन वहाँ युद्ध, कलह, षड्यंत्र और सत्ता संघर्ष ज़्यादा दिखाई देते हैं। महाभारत का अंत एक बड़े विनाश और दुःख के साथ होता है। युधिष्ठिर को धर्मराज कहा गया, पर “युधिष्ठिर राज्य” कभी आदर्श शासन की मिसाल के रूप में स्थापित नहीं हो पाया। हस्तिनापुर शक्ति का केंद्र था, पर आदर्श का नहीं।
इसके विपरीत अयोध्या वह भूमि है जहाँ रामराज्य की कल्पना जन्मी न्याय, करुणा, समानता, मर्यादा और जनकल्याण पर आधारित शासन। आज भी जब आदर्श शासन की बात होती है, उदाहरण रामराज्य का ही दिया जाता है, हस्तिनापुर का नहीं। यह दिखाता है कि भारतीय चेतना में अयोध्या हमेशा आदर्श, संतुलन और नैतिक शासन का प्रतिनिधित्व करती रही है।आज जब दिल्ली धुंध में घुट रही है, उसी समय अयोध्या एक नए सांस्कृतिक पुनर्जागरण से चमक रही है।
25 नवंबर को अयोध्या में धर्म ध्वज की स्थापना केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनरुत्थान का संकेत है।देश भर का संत समाज, बाबा बागेश्वर के नेतृत्व में, भारत की सांस्कृतिक मजबूती, उसकी परंपरागत पहचान की पुनर्स्थापना और हिंदू राष्ट्र बनाने की दिशा में आवाज़ उठा रहा है।, तब अयोध्या स्वाभाविक रूप से एक नए केंद्र के रूप में उभरती है।
अयोध्या के पास वह सब कुछ है जिसकी एक आधुनिक, सुरक्षित और दीर्घकालिक राष्ट्रीय राजधानी को आवश्यकता होती है। यहाँ की हवा साफ है, प्रदूषण नियंत्रित है, और शहर को विशाल भूमि पर योजनाबद्ध तरीके से विकसित करने की क्षमता उपलब्ध है। जनसंख्या का दबाव दिल्ली की तुलना में बहुत कम है, जिससे ट्रैफिक, अव्यवस्था और घनत्व जैसे संकट उत्पन्न नहीं होते। भौगोलिक रूप से भी अयोध्या सुरक्षित क्षेत्र में आती है न बड़े भूकंप का डर, न अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से तत्काल सुरक्षा जोखिम। साथ ही यह शहर हजारों वर्षों की सांस्कृतिक पहचान और भारत के मूल आदर्शों का वाहक है।
इन सबके बीच सरयू नदी की पवित्रता अयोध्या को और विशेष बनाती है।सरयू का स्वच्छ, निर्मल और जीवनदायिनी जल केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से एक अमूल्य संपत्ति है। जहाँ यमुना आज प्रदूषण, झाग, औद्योगिक अपशिष्ट और रसायनों के बोझ से जूझ रही है, वहीं सरयू आज भी स्वच्छ, प्रवाहमान और जीवंत है। यह अंतर सिर्फ दो नदियों का नहीं यह दो शहरों की व्यवस्था, भविष्य और पर्यावरणीय क्षमता का अंतर है।
एक राजधानी केवल भवनों से नहीं बनती; वह अपने प्राकृतिक संसाधनों, हवा-पानी, पर्यावरण, ऊर्जा, संस्कृति और दृष्टिकोण से महान बनती है।इस मापदंड पर अयोध्या दिल्ली से कई गुना आगे दिखाई देती है।सरयू जैसी स्वच्छ नदी का होना किसी भी उभरती राजधानी के लिए एक वरदान है स्वस्थ पर्यावरण, बेहतर जल प्रबंधन, पर्यटन और पारिस्थितिक स्थिरता, सब कुछ एक साथ मिलता है।
भारत की राजधानी केवल प्रशासनिक केंद्र नहीं होनी चाहिए; वह भारत की आत्मा और आदर्शों को भी प्रतिबिंबित करे। दिल्ली व्यवस्था चलाती है, लेकिन अयोध्या संस्कृति, मर्यादा और आदर्श शासन की स्मृति को जीवित रखती है। यदि भारत को वास्तव में एक नए मार्ग पर आगे बढ़ना है, तो राजधानी उस भूमि पर हो सकती है जहाँ नैतिक शासन की परंपरा जन्मी अयोध्या।
अयोध्या को राष्ट्रीय राजधानी बनाना केवल भूगोल बदलना नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक दृष्टि को पुनर्स्थापित करने का एक प्रतीकात्मक कदम भी हो सकता है। यह वह दिशा हो सकती है जिसमें भारत अपनी प्राचीन पहचान, अपने मूल आदर्शों और अपनी सांस्कृतिक चेतना को फिर से केंद्र में रखकर आगे बढ़े। एक ऐसा कदम जो भारत को नई दिशा दे।एक ऐसा फैसला जो आने वाले 1000 वर्षों की पहचान तय करे।और एक ऐसा परिवर्तन जो राष्ट्र को नई ऊँचाई दे।
समय आ गया है कि भारत अपनी राजधानी के बारे में नए दृष्टिकोण से सोचे। और उस राजधानी का नाम केवल एक हो सकता है,
“राजा राम अवध राजधानी”
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